Best collection for jagjit singh Ghazal in hindi । जगजीत सिंह Ghazal in hindi
दोस्तो आज आपके लिए पेश है jagjit singh ghazal in hindi जगजीत सिंह का नाम आते ही कई ग़ज़लें बरबस ही याद आ जाती हैं इसलिए उन्हें 'ग़ज़ल-सम्राट' कहा जाता है, उनकी दी हुई आवाज़ के कारण कई ग़ज़लें आज ज़हन में गूंजती रहती हैं। पेश हैं कुछ ऐसी ही ग़ज़ल जिनकी स्मृति होने पर ग़ज़लकार तो याद आते ही हैं लेकिन जगजीत भी स्मरण हो आते हैं।
Best collection jagjit singh Ghazal in hindi
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Best collection jagjit singh Ghazal in hindi |
जगजीत सिंह ghazal in hindi प्यार का पहला खत
प्यार का पहला ख़त लिखने में वक़्त तो लगता है,
नये परिन्दों को उड़ने में वक़्त तो लगता है.
जिस्म की बात नहीं थी उनके दिल तक जाना था,
लम्बी दूरी तय करने में वक़्त तो लगता है.
गाँठ अगर पड़ जाए तो फिर रिश्ते हों या डोरी,
लाख करें कोशिश खुलने में वक़्त तो लगता है.
हमने इलाज-ए-ज़ख़्म-ए-दिल तो ढूँढ़ लिया है,
गहरे ज़ख़्मों को भरने में वक़्त तो लगता है।
जगजीत सिंह Ghazal in hindi मयकदे से कौन प्यासा जायेगा
मय पिलाकर आपका क्या जाएगा,
जाएगा ईमान जिसका जायेगा,
देखकर मुझको वो शरमा जाएगा,
ये तमाशा किससे देखा जायेगा.
जाऊं बुतखाने से क्यूँ काबे को मैं,
हाथ से ये भी ठिकाना जाएगा,
क़त्ल की जब उसने दी धमकी मुझे,
कह दिया मैंने कि देखा जायेगा.
पी भी ले दो घूँट "ज़ाहिद" पी भी ले,
मयकदे से कौन प्यासा जायेगा.
जगजीत सिंह ghazal in hindi फूल खिला दें शाखो पर
फूल खिला दे शाखों पर, पेड़ों को फल दे मालिक,
धरती जितनी प्यासी है, उतना तो जल दे मालिक
वक़्त बड़ा दुखदायक है, पापी है संसार बहुत,
निर्धन को धनवान बना, दुर्बल को बल दे मालिक
कोहरा कोहरा सर्दी है, काँप रहा है पूरा गाँव,
दिन को तपता सूरज दे, रात को कम्बल दे मालिक
बैलों को एक गठरी घास, इंसानों को दो रोटी,
खेतों को भर गेहूं से, कांधों को हल दे मालिक
हाथ सभी के काले हैं, नजरें सबकी पीली हैं,
सीना ढांप दुपट्टे से, सर को आँचल दे मालिक
जगजीत सिंह ghazal in hindi वस्ल की रात तो
वस्ल की रात तो राहत से बसर होने दो,
शाम से ही है ये धमकी के सहर होने दो
जिसने ये दर्द दिया है वो दवा भी देगा,
नादवा है जो मेरा दर्द-ए-जिगर होने दो
ज़िक्र रुख़सत का अभी से न करो बैठो भी,
जान-ए-मन रात गुज़रने दो सहर होने दो
वस्ल-ए-दुश्मन की ख़बर मुझसे अभी कुछ ना कहो,
ठहरो-ठहरो मुझे अपनी तो ख़बर होने दो.
जगजीत सिंह Ghazal in hindi किया है प्यार जिसे
किया है प्यार जिसे हमने ज़िन्दगी की तरह
वो आशना भी मिला हमसे अजनबी की तरह
किसे खबर थी बढ़ेगी कुछ और तारिकी
छुपेगा वो किसी बदली में चाँदनी की तरह
बढ़ा के प्यास मेरी उसने हाथ छोड़ दिया
वो कर रहा था मुरव्वत भी दिल्लगी की तरह
सितम तो ये है कि वो भी ना बन सका अपना
कुबूल हमने किये जिसके ग़म खुशी की तरह
कभी ना सोचा था हमने "क़तील" उस के लिए
करेगा हम पे सितम वो भी हर किसी की तरह
जगजीत सिंह ghazal in hindi मैं भूल जाऊं तुम्हें
मैं भूल जाऊं तुम्हें
अब यही मुनासिब है
मगर भुलाना भी चाहूं
तो किस तरह भूलूं
कि तुम तो फिर भी हक़ीक़त हो
कोई ख़्वाब नहीं
यहां तो दिल का ये आलम है
क्या कहूं...
कम्बख़्त...
भुला सका ना ये वो सिलसिला जो था ही नहीं
वो इक ख़याल जो आवाज़ तक गया ही नहीं
वो एक बात जो मैं कह नहीं सका तुमसे
वो एक रब्त जो हम में कभी रहा ही नहीं
मुझे है याद वो सब जो कभी हुआ ही नहीं
अगर ये हाल है दिल का तो कोई समझाए
तुम्हें भुलाना भी चाहूं तो किस तरह भूलूं
कि तुम तो फिर भी हक़ीक़त हो कोई ख़्वाब नहीं
जगजीत सिंह Ghazal in hindi तुमने सुली पे लटकते
तुमने सूली पे लटकते जिसे देखा होगा,
वक़्त आएगा वही शख्स मसीहा होगा,
ख्वाब देखा था कि सेहरा में बसेरा होगा,
क्या ख़बर थी कि यही ख्वाब तो सच्चा होगा,
मैं फ़िज़ाओं में बिखर जाऊंगा खुशबू बनकर,
रंग होगा न बदन होगा न चेहरा होगा
जगजीत सिंह Ghazal in hindi सच्ची बात कही थी मैंने
सच्ची बात कही थी मैंने,
लोगों ने सूली पे चढाया,
मुझ को ज़हर का जाम पिलाया,
फिर भी उनको चैन न आया,
सच्ची बात कही थी मैंने,
ले के जहाँ भी वक्त गया है,
ज़ुल्म मिला है, ज़ुल्म सहा है,
सच का ये इनाम मिला है,
सच्ची बात कही थी मैंने,
सब से बेहतर कभी न बनना,
जग के रहबर कभी न बनना,
पीर पयम्बर कभी न बनना,
चुप रह कर ही वक्त गुजारो,
सच कहने पे जान मत वारो,
कुछ तो सीखो मुझ से यारों,
सच्ची बात कही थी मैंने
जगजीत सिंह Ghazal in hindi ज़िन्दगी तूने लहू ले
ज़िन्दगी तूने लहू ले के दिया कुछ भी नहीं,
तेरे दामन में मेरे वास्ते क्या कुछ भी नहीं,
मेरे इन हाथों की चाहो तो तलाशी ले लो,
मेरे हाथों में लकीरों के सिवा कुछ भी नहीं,
हमने देखा है कई ऐसे खुदाओं को यहाँ,
सामने जिनके वो सचमुच का खुदा कुछ भी नहीं,
या खुदा अबके ये किस रंग में आई है बहार,
ज़र्द ही ज़र्द है पेड़ों पे हरा कुछ भी नहीं,
दिल भी एक जिद पे अड़ा है किसी बच्चे की तरह,
या तो सब कुछ ही इसे चाहिए या कुछ भी नहीं,
जगजीत सिंह Ghazal in hindi बेनाम सा ये दर्द
बेनाम सा ये दर्द ठहर क्यूँ नहीँ जाता
जो बीत गया है वो गुज़र क्यूँ नहीं जाता
सब कुछ तो है क्या ढूँढती रहती है निगाहेँ
क्या बात है मैं वक्त पे घर क्यूँ नहीं जाता
वो एक ही चेहरा तो नहीँ सारे जहाँ में
जो दूर है वो दिल से उतर क्यूँ नहीं जाता
मैं अपनी ही उलझी हुई राहों का तमाशा
जाते है जिधर सब मैं उधर क्यूँ नहीं जाता
वो नाम जो बरसों से ना चेहरा ना बदन है
वो ख्वाब नगर है तो बिखर क्यूँ नहीं जाता
जगजीत सिंह Ghazal in hindi आँख से आँख मिला
आँख से आँख मिला बात बनाता क्यूँ है
तू अगर मुझसे ख़फ़ा है तो छुपाता क्यूँ है
ग़ैर लगता है न अपनों की तरह मिलता है
तू ज़माने की तरह मुझको सताता क्यूँ है
वक़्त के साथ हालात बदल जाते हैं
ये हक़ीक़त है मगर मुझको सुनाता क्यूँ है
एक मुद्दत से जहां काफ़िले गुज़रे ही नहीं
ऐसी राहों पे चराग़ों को जलाता क्यूँ है
जगजीत सिंह Ghazal in hindi बहुत दिनों की बात है
बहुत दिनों की बात है
फिज़ा को याद भी नहीं
ये बात आज की नहीं
बहुत दिनों की बात है
शबाब पर बहार थी
फिज़ा भी ख़ुशगवार थी
ना जाने क्यूँ मचल पड़ा
मैं अपने घर से चल पड़ा
किसी ने मुझको रोक कर
बड़ी अदा से टोक कर
कहा था लौट आईये
मेरी क़सम ना जाईये
पर मुझे ख़बर न थी
माहौल पर नज़र न थी
ना जाने क्यूँ मचल पड़ा
मैं अपने घर से चल पड़ा
मैं शहर से फिर आ गया
ख़याल था कि पा गया
उसे जो मुझसे दूर थी
मगर मेरी ज़रूर थी
और एक हसीन शाम को
मैं चल पड़ा सलाम को
गली का रंग देख कर
नई तरंग देख कर
मुझे बड़ी ख़ुशी हुई
मैं कुछ इसी ख़ुशी में था
किसी ने झांक कर कहा
पराये घर से जाईये
मेरी क़सम न आईये
वही हसीन शाम है
बहार जिसका नाम है
चला हूँ घर को छोड़ कर
न जाने जाऊँगा किधर
कोई नहीं जो टोक कर
कोई नहीं जो रोक कर
कहे कि लौट आईये
मेरी क़सम न जाईये
जगजीत सिंह Ghazal in hindi अपनी आँखों के समंदर में
अपनी आँखों के समंदर में उतर जाने दे
तेरा मुजरिम हूँ मुझे डूब के मर जाने दे
ऐ नए दोस्त मैं समझूँगा तुझे भी अपना
पहले माज़ी का कोई ज़ख़्म तो भर जाने दे
आग दुनिया की लगाई हुई बुझ जाएगी
कोई आँसू मेरे दामन पर बिखर जाने दे
ज़ख़्म कितने तेरी चाहत से मिले हैं मुझको
सोचता हूँ कि कहूँ तुझसे मगर जाने दे
जगजीत सिंह Ghazal in hindi अपने होंठों पर सजाना
अपने होंठों पर सजाना चाहता हूँ
आ तुझे मैं गुनगुनाना चाहता हूँ
कोई आँसू तेरे दामन पर गिराकर
बूँद को मोती बनाना चाहता हूँ
थक गया मैं करते-करते याद तुझको
अब तुझे मैं याद आना चाहता हूँ
छा रहा है सारी बस्ती में अँधेरा
रोशनी हो, घर जलाना चाहता हूँ
आख़री हिचकी तेरे ज़ानों पे आये
मौत भी मैं शायराना चाहता हूँ
जगजीत सिंह Ghazal in hindi मैं रोया परदेस में
मैं रोया परदेस में, भीगा माँ का प्यार,
दुख ने दुख से बात की बिन चिठ्ठी बिन तार,
छोटा करके देखिये जीवन का विस्तार,
आँखों भर आकाश है, बाहों भर संसार,
लेके तन के नाप को, घूमे बस्ती गाँव,
हर चादर के घेर से बाहर निकले पाँव,
सबकी पूजा एक सी, अलग-अलग हर रीत,
मस्जिद जाए मौलवी, कोयल गाए गीत,
पूजा घर में मूर्ति, मीरा के संग श्याम,
जिसकी जितनी चाकरी, उतने उसके दाम,
सातों दिन भगवान के, क्या मंगल क्या पीर,
जिस दिन सोए देर तक, भूखा रहे फ़कीर,
अच्छी संगत बैठकर संगी बदले रूप,
जैसे मिलकर आम से मीठी हो गई धूप,
सपना झरना नींद का, जागी आँखें प्यास,
पाना खोना खोजना साँसों का इतिहास,
चाहे गीता बांचिये या पढ़िए क़ुरान,
मेरा तेरा प्यार ही, हर पुस्तक का ज्ञान
जगजीत सिंह ghazal in hindi सोचा नहीं अच्छा बुरा
सोचा नहीं अच्छा बुरा, देखा सुना कुछ भी नहीं
मांगा ख़ुदा से रात दिन तेरे सिवा कुछ भी नहीं
सोचा तुझे, देखा तुझे, चाहा तुझे पूजा तुझे
मेरी वफ़ा मेरी ख़ता, तेरी ख़ता कुछ भी नहीं
जिस पर हमारी आँख ने मोती बिछाये रात भर
भेजा वही काग़ज़ उसे, हमने लिखा कुछ भी नहीं
इक शाम की दहलीज़ पर बैठे रहे वो देर तक
आँखों से की बातें बहुत, मुँह से कहा कुछ भी नहीं
दो चार दिन की बात है दिल ख़ाक में सो जायेगा
जब आग पर काग़ज़ रखा, बाकी बचा कुछ भी नहीं
अहसास की ख़ुशबू कहाँ, आवाज़ के जुगनू कहाँ
ख़ामोश यादों के सिवा घर में रहा कुछ भी नहीं
जगजीत सिंह ghazal in hindi हुस्न पर जब कभी
हुस्न पर जब कभी शबाब आया
सारी दुनिया में इंक़लाब आया
मेरा ख़त ही जो तूने लौटाया
लोग समझे तेरा जवाब आया
उम्र तिफली में जब ये आलम है
मार डालोगे जब शबाब आया
तेरी महफ़िल में सुकून मिलता है
इसलिए मैं भी बार बार आया
तू गुज़ारेगी ज़िंदगी कैसे
सोच कर फिर से मैं चला आया
ग़म की निस्बत न पूछिए हमसे
अपने हिस्से में बेहिसाब आया
जगजीत सिंह ghazal in hindi घर से हम निकले थे
घर से हम निकले थे मस्जिद की तरफ़ जाने को,
रिंद बहका के हमें ले गये मैख़ाने को,
ये ज़बां चलती है, नासेह के छुरी चलती है,
ज़ेबा करने मुझे आये है के समझाने को,
आज कुछ और भी पी लूं के सुना है मैने,
आते हैं हज़रत-ए-वाइज़ मेरे समझाने को,
हट गई आरिज़-ए-रोशन से तुम्हारे जो नक़ाब,
रात भर शम्मा से नफ़रत रही दीवाने को.
जगजीत सिंह ghazal in hindi चराग़-ए-इश्क़
चराग़-ए-इश्क़ जलाने की रात आई है,
किसी को अपना बनाने की रात आई है,
फ़लक का चांद भी शरमा के मुंह छुपाएगा,
नक़ाब रुख़ से हटाने की रात आई है,
निग़ाह-ए-साक़ी से पैहम छलक रही है शराब,
पियो के पीने पिलाने की रात आई है,
वो आज आये हैं महफ़िल में चांदनी लेकर,
के रौशनी में नहाने की रात आई है
जगजीत सिंह ghazal in hindi दिन गुज़र गया ऐतबार में
दिन गुज़र गया ऐतबार में
रात कट गयी इंतज़ार में
वो मज़ा कहाँ वस्ल-ए-यार में
लुत्फ़ जो मिला इंतज़ार में
उनकी इक नज़र काम कर गयी
होश अब कहाँ होशियार में
मेरे कब्ज़े में आईना तो है
मैं हूँ आपके इख्तेयार में
आँख तो उठी फूल की तरफ
दिल उलझ गया हुस्न-हार में
तुमसे क्या कहें, कितने ग़म सहे
हमने बेवफ़ा तेरे प्यार में
फ़िक्र-ए-आशियां हर खिज़ाम की
आशियां जला हर बहार में
किस तरह ये ग़म भूल जाएं हम
वो जुदा हुआ इश्तिहार में
जगजीत सिंह Ghazal in hindi तुम ये कैसे जुदा हो गये
तुम ये कैसे जुदा हो गये
हर तरफ़ हर जगह हो गये
अपना चेहरा न बदला गया
आईने से ख़फ़ा हो गये
जाने वाले गये भी कहाँ
चाँद सूरज घटा हो गये
बेवफ़ा तो न वो थे न हम
यूँ हुआ बस जुदा हो गये
आदमी बनना आसाँ न था
शेख़ जी आप हो गये
जगजीत सिंह ghazal in hindi खुमारी चढ़ के उतर गई
खुमारी चढ़ के उतर गई
ज़िंदगी यूं ही गुजर गई
कभी सोते सोते कभी जागते
ख़्वाबों के पीछे यू ही भागते
अपनी तोः सारी उमर गई
खुमारी चढ़ के उतर गई
ज़िंदगी यूं ही गुजर गई
रंगीन बहारों की ख्वाहिश रही
हाथ मगर कुत्च आया नही
कहने को अपने थे साथी कई
साथ किसीने निभाया नही
कोई भी हमसफ़र नही
खो गई हर डगर कही
कभी सोते सोते कभी जागते
ख़्वाबों के पीछे यू ही भागते
अपनी तोह सारी उमर गई
खुमारी चढ़ के उतर गई
ज़िंदगी यूं ही गुजर गई
लोगों को अक्सर देखा है
घर के लिए रोते हुए
हम तोः मगर बेघर ही रहे
घरवालों के होते हुए
आया अपना नज़र नही
अपनी जहाँ तक नज़र गई
कभी सोते सोते कभी जागते
ख़्वाबों के पीछे यू ही भागते
अपनी तोः सारी उमर गई
खुमारी चढ़ के उतर गई
ज़िंदगी यूं ही गुजर गई
पहले तोः हम सुन लेते थे
शोर में भी शेह्नैया
अब तोः हमको लगती है
भीड़ में भी तन्हैया
जीने की हसरत किधर गई
दिल की कली बिखर गई
कभी सोते सोते कभी जागते
ख़्वाबों के पीछे यू ही भागते
अपनी तोः सारी उमर गई
खुमारी चढ़ के उतर गई
ज़िंदगी यूं ही गुजर गई
