Mirza ghalib ghazal । Hindi ghazal Ghalib Mirza sahab
मशहूर शायर मिर्ज़ा ग़ालिब (Mirza Ghalib) की आज 221वीं जयंती (Mirza Ghalib's 221th Birthday) है. मिर्ज़ा ग़ालिब का जन्म (Mirza Ghalib Birthday) 27 दिसंबर, 1797 को हुआ था और उनका असली नाम मिर्जा असुद्ल्लाह बेग खान था. मिर्ज़ा ग़ालिब (Mirza Ghalib) को उर्दू, फारसी और तुर्की समेत कई भाषाओं का ज्ञान था. उन्होंने फारसी और उर्दू रहस्यमय-रोमांटिक अंदाज में अनगिनत गजलें लिखीं. ग़ालिब (Ghalib) की शादी बहुत ही कम उम्र में हो गई थी. ग़ालिब की दो कमजोरियां थीं- शराब और जुआं. ये दो बुरी आदतें जिंदगी भर उनका पीछा नहीं छोड़ पाईं. मिर्ज़ा ग़ालिब की शायरी में दर्द और इश्क का जिक्र खुलकर आता है. मिर्ज़ा ग़ालिब की शायरी के अलावा उनके लिखें शेर और ग़ज़लें भी बेहद पसंद की जाती हैं. ग़ालिब की एक ग़ज़ल की कुछ पक्तियां आज भी लोगों की जुबान पर रहती हैं.
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| Galib ki ghazale in hindi |
Mirza ghalib ki Ghazal in Hindi
Mirza ghalib ghazal in Hindi नफ़स न अंजुमन-ए-आरज़ू
नफ़स न अंजुमन-ए-आरज़ू से बाहर खींच
अगर शराब नहीं इन्तज़ार-ए-साग़र खींच
कमाल-ए-गरमी-ए सई-ए-तलाश-ए-दीद न पूछ
ब रंग-ए-ख़ार मिरे आइने से जौहर खींच
तुझे बहाना-ए-राहत है इन्तज़ार ऐ दिल
किया है किस ने इशारा कि नाज़-ए-बिस्तर खींच
तिरी तरफ़ है ब हसरत नज़ारा-ए-नरगिस
ब कोरी-ए-दिल-ओ-चश्म-ए रक़ीब साग़र खींच
ब नीम-ग़मज़ा अदा कर हक़-ए वदीअत-ए-नाज़
नियाम-ए --परदा-ए ज़ख्म-ए-जिगर से खंज़र खींच
मिरे क़ददा में है सहबा-ए-आतिश-ए-पिनहां
ब रू-ए सुफ़रा कबाब-ए-दिल-ए-समन्दर खींच
Mirza ghalib ghazal in hindi देख कर दर-पर्दा
देख कर दर-पर्दा गर्म-ए-दामन-अफ़्शानी मुझे
कर गई वाबस्ता-ए-तन मेरी उर्यानी मुझे
बन गया तेग़-ए-निगाह-ए-यार का संग-ए-फ़साँ
मरहबा मैं क्या मुबारक है गिराँ-जानी मुझे
क्यूँ न हो बे-इल्तिफ़ाती उस की ख़ातिर जम्अ है
जानता है महव-ए-पुर्सिश-हा-ए-पिन्हानी मुझे
मेरे ग़म-ख़ाने की क़िस्मत जब रक़म होने लगी
लिख दिया मिन-जुमला-ए-असबाब-ए-वीरानी मुझे
बद-गुमाँ होता है वो काफ़िर न होता काश के
इस क़दर ज़ौक़-ए-नवा-ए-मुर्ग़-ए-बुस्तानी मुझे
वाए वाँ भी शोर-ए-महशर ने न दम लेने दिया
ले गया था गोर में ज़ौक़-ए-तन-आसानी मुझे
वादा आने का वफ़ा कीजे ये क्या अंदाज़ है
तुम ने क्यूँ सौंपी है मेरे घर की दरबानी मुझे
हाँ नशात-ए-आमद-ए-फ़स्ल-ए-बहारी वाह वाह
फिर हुआ है ताज़ा सौदा-ए-ग़ज़ल-ख़्वानी मुझे
दी मिरे भाई को हक़ ने अज़-सर-ए-नौ ज़िंदगी
मीरज़ा यूसुफ़ है ग़ालिब यूसुफ़-ए-सानी मुझे
Mirza ghalib ghazal in hindi तपिश से मेरी वक़्फ़-ए-कशमकश
तपिश से मेरी वक़्फ़-ए-कशमकश हर तार-ए-बिस्तर है
मिरा सर रंज-ए-बालीं है मिरा तन बार-ए-बिस्तर है
सरिश्क-ए-सर ब-सहरा दादा नूर-उल-ऐन-ए-दामन है
दिल-ए-बे-दस्त-ओ-पा उफ़्तादा बर-ख़ुरदार-ए-बिस्तर है
ख़ुशा इक़बाल-ए-रंजूरी अयादत को तुम आए हो
फ़रोग-ए-शम-ए-बालीं ताल-ए-बेदार-ए-बिस्तर है
ब-तूफ़ाँ-गाह-ए-जोश-ए-इज़्तिराब-ए-शाम-ए-तन्हाई
शुआ-ए-आफ़्ताब-ए-सुब्ह-ए-महशर तार-ए-बिस्तर है
अभी आती है बू बालिश से उस की ज़ुल्फ़-ए-मुश्कीं की
हमारी दीद को ख़्वाब-ए-ज़ुलेख़ा आर-ए-बिस्तर है
कहूँ क्या दिल की क्या हालत है हिज्र-ए-यार में ग़ालिब
कि बेताबी से हर-यक तार-ए-बिस्तर ख़ार-ए-बिस्तर है
Mirza ghalib ghazal in Hindi ज़माना सख़्त कम-आज़ार है
ज़माना सख़्त कम-आज़ार है ब-जान-ए-असद
वगरना हम तो तवक़्क़ो ज़्यादा रखते हैं
तन-ए-ब-बंद-ए-हवस दर नदादा रखते हैं
दिल-ए-ज़-कार-ए-जहाँ ऊफ़्तादा रखते हैं
तमीज़-ए-ज़िश्ती-ओ-नेकी में लाख बातें हैं
ब-अक्स-ए-आइना यक-फ़र्द-ए-सादा रखते हैं
ब-रंग-ए-साया हमें बंदगी में है तस्लीम
कि दाग़-ए-दिल ब-जाबीन-ए-कुशादा रखते हैं
ब-ज़ाहिदाँ रग-ए-गर्दन है रिश्ता-ए-ज़ुन्नार
सर-ए-ब-पा-ए-बुत-ए-ना-निहादा रखते हैं
मुआफ़-ए-बे-हूदा-गोई हैं नासेहान-ए-अज़ीज़
दिल-ए-ब-दस्त-ए-निगारे नदादा रखते हैं
ब-रंग-ए-सब्ज़ा अज़ीज़ान-ए-बद-ज़बान यक-दस्त
हज़ार तेग़-ए-ब-ज़हर-आब-दादा रखते हैं
अदब ने सौंपी हमें सुर्मा-साइ-ए-हैरत
ज़-बन-ए-बस्ता-ओ-चश्म-ए-कुशादा रखते हैं
Mirza ghalib ghazal in hindi जब तक दहान-ए-ज़ख़्म
जब तक दहान-ए-ज़ख़्म न पैदा करे कोई
मुश्किल कि तुझ से राह-ए-सुख़न वा करे कोई
आलम ग़ुबार-ए-वहशत-ए-मजनूँ है सर-ब-सर
कब तक ख़याल-ए-तुर्रा-ए-लैला करे कोई
अफ़सुरदगी नहीं तरब-इनशा-ए इलतिफ़ात
हां दरद बन के दिल में मगर जा करे कोई
रोने से अय नदीम मलामत न कर मुझे
आख़िर कभी तो `उक़दह-ए दिल वा करे कोई
चाक-ए-जिगर से जब रह-ए पुरसिश न वा हुई
कया फ़ाइदा कि जेब को रुसवा करे कोई
लख़त-ए जिगर से है रग-ए हर ख़ार शाख़-ए-गुल
ता चनद बाग़-बानी-ए सहरा करे कोई
ना-कामी-ए निगाह है बरक़-ए नज़ारा-सोज़
तू वह नहीं कि तुझ को तमाशा करे कोई
हर सनग-ओ-ख़िशत है सदफ़-ए गौहर-ए-शिकस्त
नुक़सां नहीं जुनूं से जो सौदा करे कोई
सर-बर हुई न व`दह-ए सबर-आज़मा से `उमर
फ़ुरसत कहां कि तेरी तमनना करे कोई
है वहशत-ए तबी`अत-ए ईजाद यास-ख़ेज़
यह दरद वह नहीं कि न पैदा करे कोई
बे-कारी-ए-जुनूं को है सर पीटने का शग़ल
जब हाथ टूट जाएं तो फिर कया करे कोई
हुसन-ए फ़ुरोग़-ए शम-ए सुख़न दूर है असद
पहले दिल-ए-गुदाख़ता पैदा करे कोई
वहशत कहां कि बे-ख़वुदी इनशा करे कोई
हसती को लफ़ज़-ए-मानी-ए-अनक़ा करे कोई
जो कुछ है महव-ए-शोख़ी-ए-अबरू-ए यार है
आंखों को रख के ताक़ पह देखा करे कोई
अरज़-ए-सिरिशक पर है फ़ज़ा-ए ज़माना तंग
सहरा कहां कि दावत-ए-दरया करे कोई
वह शोख़ अपने हुस्न पह मग़रूर है असद
दिखला के उस को आइना तोड़ा करे कोई
Mirza ghalib ghazal in Hindi गर तुझ को है यक़ीन
गर तुझ को है यक़ीन-ए-इजाबत दुआ न माँग
यानी बग़ैर-ए-यक-दिल-ए-बे-मुद्दआ न माँग
आता है दाग़-ए-हसरत-ए-दिल का शुमार याद
मुझ से मिरे गुनह का हिसाब ऐ ख़ुदा न माँग
अय आरज़ू शहीद-ए वफ़ा ख़ूं-बहा न माँग
जुज़ बहर-ए दसत-ओ-बाज़ू-ए क़ातिल दुआ न माँग
बर-हम है बज़म-ए ग़ुनचह ब यक जुनबिश-ए नशात
काशानह बसकि तनग है ग़ाफ़िल हवा न माँग
मैं दूर गरद-ए-अरज़-ए-रुसूम-ए-नियाज़ हूँ
दुशमन समझ वले निगह-ए आशना न माँग
यक-बख़त औज नज़र-ए-सुबुक-बारी-ए असद
सर पर वबाल-ए सायह-ए बाल-ए-हुमा न माँग
Mirza ghalib ghazal in Hindi कार-गाह-ए-हस्ती में
कार-गाह-ए-हस्ती में लाला दाग़-सामाँ है
बर्क़-ए-ख़िर्मन-ए-राहत ख़ून-ए-गर्म-ए-दहक़ाँ है
ग़ुंचा ता शगुफ़्तन-हा बर्ग-ए-आफ़ियत मालूम
बा-वजूद-ए-दिल-जमई ख़्वाब-ए-गुल परेशाँ है
हम से रंज-ए-बेताबी किस तरह उठाया जाए
दाग़ पुश्त-ए-दस्त-ए-अज्ज़ शोला ख़स-ब-दंदाँ है
इश्क़ के तग़ाफ़ुल से हर्ज़ा-गर्द है आलम
रू-ए-शश-जिहत-आफ़ाक़ पुश्त-ए-चश्म-ए-ज़िन्दाँ है
Mirza ghalib ghazal in Hindi कहते तो हो तुम सब
कहते तो हो तुम सब कि बुत-ए-ग़ालिया-मू आए
यक मरतबा घबरा के कहो कोई कि वो आए
हूँ कशमकश-ए-नज़ा में हाँ जज़्ब-ए-मोहब्बत
कुछ कह न सकूँ पर वो मिरे पूछने को आए
है साइक़ा-ओ-शोला-ओ-सीमाब का आलम
आना ही समझ में मिरी आता नहीं गो आए
ज़ाहिर है कि घबरा के न भागेंगे नकीरें
हां मुंह से मगर बादा-ए-दोशीना की बो आए
जललाद से डरते हैं न वाइज़ से झगड़ते
हम समझे हुए हैं उसे जिस भेस में जो आए
हां अहल-ए-तलब कौन सुने ताना-ए-ना-याफ़त
देखा कि वह मिलता नहीं अपने ही को खो आए
अपना नहीं वह शेवह कि आराम से बैठें
उस दर पह नहीं बार तो क`बे ही को हो आए
की हम-नफ़सों ने असर-ए गिरयह में तक़रीर
अचछे रहे आप उस से मगर मुझ को डुबो आए
उस अनजुमन-ए नाज़ की कया बात है ग़ालिब
हम भी गए वां और तिरी तक़दीर को रो आए
Mirza ghalib ghazal in Hindi क्या तंग हम सितमज़दगां
क्या तंग हम सितमज़दगां का जहान है
जिस में कि एक बैज़ा-ए-मोर आसमान है
है कायनात को हरकत तेरे ज़ौक़ से
परतव से आफ़ताब के ज़ररे में जान है
हालांकिह है यह सीली-ए ख़ारा से लालह रनग
ग़ाफ़िल को मेरे शीशे पह मै का गुमान है
की उस ने गरम सीनह-ए अहल-ए हवस में जा
आवे न कयूं पसनद कि ठनडा मकान है
क्या ख़ूब तुम ने ग़ैर को बोसह नहीं दिया
बस चुप रहो हमारे भी मुंह में ज़बान है
बैठा है जो कि सायह-ए दीवार-ए यार में
फ़रमां-रवा-ए किशवर-ए हिनदूसतान है
हस्ती का ए'तिबार भी ग़म ने मिटा दिया
किस से कहूं कि दाग़ जिगर का निशान है
है बारे ए'तिमाद-ए वफ़ा-दारी इस क़दर
ग़ालिब हम इस में ख़वुश हैं कि ना-मिहरबान है
Mirza ghalib ghazal in Hindi अफ़सोस कि दनदां का
अफ़सोस कि दनदां का किया रिज़क़ फ़लक ने
जिन लोगों की थी दर-ख़ुर-ए-अक़्द-ए-गुहर अंगुश्त
काफ़ी है निशानी तिरा छल्ले का न देना
ख़ाली मुझे दिखला के ब-वक़्त-ए-सफ़र अंगुश्त
लिखता हूं असद सोज़िश-ए दिल से सुख़न-ए गरम
ता रख न सके कोई मिरे हरफ़ पर अनगुशत
Mirza ghalib ghazal in Hindi हाँ दिल-ए-दर्दमंद ज़म
हाँ दिल-ए-दर्दमंद ज़म-ज़मा साज़
क्यूँ न खोले दर-ए-ख़ज़िना-ए-राज़
ख़ामे का सफ़्हे पर रवाँ होना
शाख़-ए-गुल का है गुल-फ़िशाँ होना
मुझ से क्या पूछता है क्या लिखिये
नुक़्ता हाये ख़िरदफ़िशाँ लिखिये
बारे, आमों का कुछ बयाँ हो जाये
ख़ामा नख़्ले रतबफ़िशाँ हो जाये
आम का कौन मर्द-ए-मैदाँ है
समर-ओ-शाख़, गुवे-ओ-चौगाँ है
ताक के जी में क्यूँ रहे अर्माँ
आये, ये गुवे और ये मैदाँ!
आम के आगे पेश जावे ख़ाक
फोड़ता है जले फफोले ताक
न चला जब किसी तरह मक़दूर
बादा-ए-नाब बन गया अंगूर
ये भी नाचार जी का खोना है
शर्म से पानी पानी होना है
मुझसे पूछो, तुम्हें ख़बर क्या है
आम के आगे नेशकर क्या है
Mirza ghalib ghazal in Hindi कलकत्ते का जो ज़िक्र किया
कलकत्ते का जो ज़िक्र किया तूने हमनशीं
इक तीर मेरे सीने में मारा के हाये हाये
वो सब्ज़ा ज़ार हाये मुतर्रा के है ग़ज़ब
वो नाज़नीं बुतान-ए-ख़ुदआरा के हाये हाये
सब्रआज़्मा वो उन की निगाहें के हफ़ नज़र
ताक़तरूबा वो उन का इशारा के हाये हाये
वो मेवा हाये ताज़ा-ए-शीरीं के वाह वाह
वो बादा हाये नाब-ए-गवारा के हाये हाये
Mirza ghalib ghazal in Hindi न होगा यक बयाबाँ माँदगी
न होगा यक बयाबाँ माँदगी से ज़ौक़ कम मेरा
हुबाब-ए-मौज-ए-रफ़्तार है, नक़्श-ए-क़दम मेरा
मुहब्बत थी चमन से, लेकिन अब ये बेदिमाग़ी है
के मौज-ए-बू-ए-गुल से नाक में आता है दम मेरा
Mirza ghalib ghazal in Hindi शुमार-ए सुबह मरग़ूब-ए
शुमार-ए सुबह मरग़ूब-ए बुत-ए-मुश्किल पसंद आया
तमाशा-ए बयक-कफ़ बुरदन-ए सद दिल पसंद आया
ब फ़ैज़-ए बे-दिली नौमीदी-ए जावेद आसां है
कुशायिश को हमारा `उक़द-ए मुश्किल पसंद आया
हवा-ए सैर-ए गुल आईना-ए बे-मिहरी-ए क़ातिल
कि अंदाज़-ए ब ख़ूं-ग़लतीदन-ए बिस्मिल पसंद आया
रवानियाँ -ए मौज-ए ख़ून-ए बिस्मिल से टपकता है
कि लुतफ़-ए बे-तहाशा-रफ़तन-ए क़ातिल पसंद आया
असद हर जा सुख़न ने तरह-ए बाग़-ए-तज़ डाली है
मुझे रंग-ए बहार-ईजादी-ए बेदिल पसंद आया
Mirza ghalib ghazal in Hindi हर एक बात पे कहते
हर एक बात पे कहते हो तुम कि तू क्या है
तुम्हीं कहो कि ये अंदाज़-ए-गुफ़्तगू क्या है
न शोले में ये करिश्मा न बर्क़ में ये अदा
कोई बताओ कि वो शोखे-तुंदख़ू क्या है
ये रश्क है कि वो होता है हमसुख़न हमसे
वरना ख़ौफ़-ए-बदामोज़ी-ए-अदू क्या है
चिपक रहा है बदन पर लहू से पैराहन
हमारी ज़ेब को अब हाजत-ए-रफ़ू क्या है
जला है जिस्म जहाँ दिल भी जल गया होगा
कुरेदते हो जो अब राख जुस्तजू क्या है
रगों में दौड़ते फिरने के हम नहीं क़ायल
जब आँख ही से न टपका तो फिर लहू क्या है
वो चीज़ जिसके लिये हमको हो बहिश्त अज़ीज़
सिवाए बादा-ए-गुल्फ़ाम-ए-मुश्कबू क्या है
पियूँ शराब अगर ख़ुम भी देख लूँ दो चार
ये शीशा-ओ-क़दह-ओ-कूज़ा-ओ-सुबू क्या है
रही न ताक़त-ए-गुफ़्तार और अगर हो भी
तो किस उम्मीद पे कहिये के आरज़ू क्या है
बना है शह का मुसाहिब, फिरे है इतराता
वगर्ना शहर में ग़ालिब की आबरू क्या है
Mirza ghalib ghazal in Hindi आ कि मेरी जान को
आ कि मेरी जान को क़रार नहीं है
ताक़ते-बेदादे-इन्तज़ार नहीं है
देते हैं जन्नत हयात-ए-दहर के बदले
नश्शा बअन्दाज़-ए-ख़ुमार नहीं है
गिरिया निकाले है तेरी बज़्म से मुझ को
हाये! कि रोने पे इख़्तियार नहीं है
हम से अबस है गुमान-ए-रन्जिश-ए-ख़ातिर
ख़ाक में उश्शाक़ की ग़ुब्बार नहीं है
दिल से उठा लुत्फे-जल्वाहा-ए-मआनी
ग़ैर-ए-गुल आईना-ए-बहार नहीं है
क़त्ल का मेरे किया है अहद तो बारे
वाये! अगर अहद उस्तवार नहीं है
तू ने क़सम मैकशी की खाई है ग़ालिब
तेरी क़सम का कुछ ऐतबार नहीं है
Mirza ghalib ghazal in Hindi बूए-गुल, नाला-ए-दिल
बूए-गुल, नाला-ए-दिल, दूदे चिराग़े महफ़िल
जो तेरी बज़्म से निकला सो परीशाँ निकला।
चन्द तसवीरें-बुताँ चन्द हसीनों के ख़ुतूत,
बाद मरने के मेरे घर से यह सामाँ निकला।
Mirza ghalib ghazal in Hindi न था कुछ तो ख़ुदा था
न था कुछ तो ख़ुदा था, कुछ न होता तो ख़ुदा होता,
डुबोया मुझको होने ने न मैं होता तो क्या होता !
हुआ जब गम से यूँ बेहिश तो गम क्या सर के कटने का,
ना होता गर जुदा तन से तो जहानु पर धरा होता!
हुई मुद्दत कि ग़ालिब मर गया पर याद आता है,
वो हर इक बात पर कहना कि यूँ होता तो क्या होता !
Mirza ghalib ghazal in Hindi ये हम जो हिज्र में दीवार
ये हम जो हिज्र में दीवार-ओ-दर को देखते हैं
कभी सबा को, कभी नामाबर को देखते हैं
वो आए घर में हमारे, खुदा की क़ुदरत हैं!
कभी हम उमको, कभी अपने घर को देखते हैं
नज़र लगे न कहीं उसके दस्त-ओ-बाज़ू को
ये लोग क्यूँ मेरे ज़ख़्मे जिगर को देखते हैं
तेरे ज़वाहिरे तर्फ़े कुल को क्या देखें
हम औजे तअले लाल-ओ-गुहर को देखते हैं
Mirza ghalib ghazal in Hindi दिन बीता लो आई रात
दिन बीता लो आई रात
जीवन की सच्चाई रात
अक्सर नापा करती है
आँखों की गहराई रात
सारी रात पे भारी है
शेष बची चौथाई रात
मेरे दिन के बदले फिर
लो उसने लौटाई रात
नखरे सुब्ह के देखे हैं
कब हमसे शरमाई रात
बिस्तर-बिस्तर लेटी है
कितनी है हरजाई रात
सोए नहीं अकेला तुम
फिर किस तरह बिताई रात
